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विजयादशमी या दशहरा Dussehra

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विजयादशमी या दशहरा Dussehra

विजया दशमी हिंदुओं का प्रमुख पर्व है, इसे दशहरा भी कहते हैं। दशहरा आश्विन माह की दसवीं तिथि को मनाया जाता है ।

इस वर्ष दशहरा देश के विभिन्न हिस्सों में 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा । सभी इसे बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं।  दशहरा उत्सव अच्छाई की बुराई पर विजय के प्रतीकात्मक रूप में मनाया जाता है इसी दिन भगवान् श्रीराम ने रावण पर जीत प्राप्त कर अपनी पत्नी सीता को छुड़ाया था।

कहा जाता है कि आज ही के दिन श्री राम ने  रावण राक्षस का वध किया था इसके उपलक्ष्य में दशहरा मनाया जाता है ।

अक्टूबर या नवम्बर में पड़ता है दशहरा Dussehra

अश्विन माह अक्टूबर या नवंबर में पड़ता है जिससे इस माह में ठण्ड का हल्का आगमन हो जाता है। यह महीना बड़ा ही खुशगवार होता है। इस महीने में न तो अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक सर्दी होती है।

दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द ‘दश- हर’ से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ दस बुराइयों से छुटकारा पाना है।

विजयादशमी का त्योहार दस दिनों तक चलता रहता है। आश्विन मास शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से इसका आरंभ होता है। दशमी के दिन इसकी समाप्ति होती है।

प्रतिपदा के दिन देवी भगवती की स्थापना की जाती है। कलश सजाया जाता है जिसके ऊपर जौ उगाते हैं। आठ दिनों तक नियमपूर्वक देवी की पूजा, कीर्तन और दुर्गा-पाठ होता है।

नवमी के दिन कन्याओं को भोजन खिलाया जाता है। उसके बाद देवी की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। इस उत्सव को ‘नवरात्र’ भी कहते हैं।

विभिन्न जगह अलग अलग तरीके से मनाते हैं

दशहरे का संबंध शक्ति से भी है जिस प्रकार ज्ञान के लिए सरस्वती की उपासना की जाती है उसी प्रकार शक्ति के लिए मां दुर्गा की उपासना की जाती है।

बंगाल अन्य क्षेत्रों में दशहरा को  दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। माँ दुर्गा  ने महिषासुर राक्षस का वध किया था और माँ दुर्गा ने माँ महिषासुर मर्दानी का रूप धारण करके  चंड-मुंड का राक्षसो का वध किया था

दशहरे के दस दिन पहले से रामलीलाओं का प्रदर्शन किया जाता है। भारत के हर शहर एवं गाँव में रामलीला दिखाई जाती है। दशहरे के दिन रावण, कुम्भकर्ण एवं मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं।

लोग तो इन्हीं पुतलों की आतिशबाजी देखने दूर दूर से आते हैं। दशहरे के दिन आतिशबाजी दर्शकों का मन मोह लेती है। कई शहरों में तो आतिशबाजी की प्रतियोगिता होती है जिनमें आगरा शहर प्रमुख है।

आतिशबाजी के लिए मशहूर

जिसकी आतिशबाजी सबसे अच्छी होती है, उसे ईनाम दिया जाता है। आतिशबाजी दिखाने के बाद रामचंद्र जी रावण का वध करते हैं। फिर बारी-बारी से पुतलों में आग लगाई जाती है।

पहले कुंभकर्ण का पुतला जलाया जाता है। उसके बाद मेघनाद के पुतले में आग लगाई जाती है और सबसे बाद में रावण के पुतले में आग लगाई जाती है।

दशहरे का पर्व असत्य पर सत्य एवं बुराई पर अच्छाई की विजय माना जाता है। इस दिन श्री राम ने बुराई के प्रतीक रावण का वध किया था। अतः हमें भी अपनी बुराइयों को त्यागकर अच्छाइयों को ग्रहण करना चाहिए।

बंगाल में तथा कुछ अन्य क्षेत्रों में भी इस पर्व को ‘दुर्गा पूजा’ के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में पूजा करनेवाले बड़े संयम से रहते हैं। दशमी के दिन विशेष उत्सव मनाया जाता है।

कई स्थानों पर बड़े-बड़े मेले लगते हैं। राजस्थान में शक्ति-पूजा की जाती है। मिथिला और बंगाल में आश्विन शुक्लपक्ष में दुर्गा की पूजा होती है।मैसूर का दशहरा पर्व देखने लायक होता है। वहाँ इस दिन चामुंडेश्वरी देवी के मंदिर की सजावट अनुपम होती है। यह पर्व सारे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

विजयादशमी के अवसर पर क्षत्रिय अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते हैं। जिन घरों में घोड़ा होता है, वहाँ विजयादशमी के दिन उसे आँगन में लाया जाता है। इसके बाद उस घोड़े को विजयादशमी की परिक्रमा कराई जाती है ।