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सिंहासन बत्तीसी

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एक दिन राजा भोज को दरबार मे खबर मिलती है कि एक साधारण सा चरवाहा अपने न्याय के लिए दिन प्रतिदिन विख्यात होता जा रहा है ।

लोगों ने बताया कि वो बालक एकदम जाहिल और अनपढ़ है तथा भैंस बकरियाँ चराने का काम करता है।

तब राजा भोज को सच जानने की इच्छा हुई और उन्होंने पता लगाने को गुप्तचर भेजे तो पता चला कि वह चरवाहा सारे फ़ैसले एक मिट्टी के टीले पर चढ़कर करता है।

राजा भोज की जिज्ञासा बढ़ी और उन्होंने खुद भेष बदलकर उस चरवाहे को आत्मविश्वास से एक जटिल मामले में फैसला करते देखा।

उन्होंने चरवाहे से मिलकर उसकी इस क्षमता के बारे में पूछा तो चरवाहे ने बताया कि उसमें यह शक्ति मिट्टी के इस टीले पर बैठने के बाद स्वत: ही आती है ।

राजा भोज ने सोचविचार कर टीले को खुदवाकर देखने का फैसला किया। खुदाई में एक राजसिंहासन मिट्टी में दबा दिखा।

इसमें बत्तीस पुतलियाँ लगी थीं तथा कीमती रत्न जड़े हुए थे। सिंहासन को उठाकर महल लाया गया तथा शुभ मुहूर्त में राजा का बैठना निश्चित किया गया।

जैसे ही राजा भोज ने बैठने का प्रयास किया सारी पुतलियाँ राजा का उपहास कर खिलखिलाने लगीं ।

कारण पूछने पर सारी पुतलियाँ बोली कि यह सिंहासन राजा विक्रमादित्य का है, इस पर बैठने वाला उनकी तरह योग्य, पराक्रमी, दानवीर तथा विवेकशील होना चाहिए।

ज्यादा पूछने पर एक-एक कर सभी 32 पुतलियों ने महाराजा विक्रमादित्य की कहानी सुनाना शुरू किया ।

यही सिंहासन बत्तीसी ३२ कथाओं का संग्रह मानी जाती है ।