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वो सुहानी यादें -3

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क्या आपके समय की बात है ?

जब कैमरे में एक रील ड़ाला जाता था जिसमें मात्र 36 फोटो ही खींचे जा सकते थे , किसी भी प्रोग्राम के फोटो लेने में फोटोग्राफर को कुछ लाइन कई कई बार और कई लोगों से सुननी पड़ती थीं जैसे “यार फ्लैश मारकर तो खुश नहीं कर दिया” और “कैमरा में रील तो डाली है ना , भूल तो नहीं गया ”

साहब उस समय पढ़ाई का बड़ा क्रेज था पढ़ाई वो भी कॉमिक्स की , किराए पर लाई जाती थीं 2 तू ला और 2 मैं लाता हूँ कल धीरू की और सोनू की बारी है , मतलब किराए पर कॉमिक्स लाकर सारे दोस्त बदल बदल कर एक ही दिन में छः सात कॉमिक्स निपटा देते थे । और अगर पढ़ाई के दिनों में कॉमिक्स के साथ पकड़े गए तो घर में भूचाल आ जाता था और शिकायत तो सभी दोस्तों के घरों तक सेकेंडो में पहुंच जाती थी , मतलब एक पकड़ा तो सब गए ।

शाम ढलते ही पढ़ाई के लिए रोशनी के साधन मिट्टी के तेल की लेम्प, और लालटेन हुआ करती थीं, थोड़ा स्टैंडर्ड अच्छा है तो पेट्रोमैक्स (गैस वाला हंडा) जिनके मेन्टल हिलने भर से या कीड़ों के टकराने से तुरंत टूट जाया करते थे , दो चार मेन्टल पहले से रखे रहते थे इसी वजह से , गर्मियों के दिन में पेट्रोमैक्स की गर्मी में पढ़ाई करना बड़ा मुश्किल था , एक तो कीड़े बहुत आते थे ऊपर से पसीने में तरबतर , और गर्मी में पढ़ाई का मतलब नींद के झोंके आना तुरंत शुरू , और फिर जिसको नींद के झोंके आ रहे उसको देख अगल बगल सबका खिलखिलाना ।

स्कूल से आते ही बस्ता फेंका खाना वाना इतना जरूरी नहीं था जितना जरूरी थी क्रिकेट , बस बहाना भर ढूँढते थे फील्ड तक पहुंचने का , जो घर से नहीं निकला उसे बुलाने दोस्त यार घर तक पहुंच जाते थे । बल्ले तो किसी किसी पर ही थे और बॉल के लिए होता था चंदा । विकेट का काम हमेशा ईंट लगाकर ही होता था , और कभी कभी तो दीवार पर लाइन बनाकर भी , जहाँ कीपर की भी जरूरत नहीं होती थी । अब खिलाडियों की संख्या विषम होने पर एक बनता था बीच का कौआ जिसे कभी कभी डबल फायदा होता था दोनों साइड से बैटिंग का और कभी कभी नंबर ही नहीं आता था । यहाँ नियम भी अपने खुद के होते थे अगर बॉल को जोर से मारा तो चौका और छक्का तो हो ही सकता था साथ साथ आउट भी संभव था अगर बॉल निषिद्ध क्षेत्र में गई मतलब आउट और अब बॉल भी वही उठाकर लाएगा ।

हादसे भी अक्सर हो ही जाते थे किसी के हाथ मे बॉल लगना तो किसी के पैर में , कभी ऊँगली चोटिल तो कभी अँगूठा । एक बार तो बाउंड्री पर खड़े छोटे बच्चे के दिल पर बॉल लगी और वो बेहोश , शॉट मारने वाले को फरार कर दिया मतलब घर भेज दिया और बच्चे को लेकर सीधा डॉक्टर पर थोड़ी टेंशन बाद में जय हो प्रभु सब ठीक हुआ, और दो दिन बाद फिर से वही सब कुछ खेल शुरू ।

घरों के सीढ़ियां न हुईं क्लास रूम हो गए , जिसे देखो सीढ़ियों पर ही पढ़ने बैठता था अपने कमरों में नहीं , अब 4 या 6 इकट्ठे बैठे हों तो पढ़ाई कैसी होगी सब जानते ही होंगे खैर हर चीज का अपना स्वाद और मजा होता है ।

हमारे दोस्त तो तहकीकात जैसे जासूसी धारावाहिक देख देख कर जासूस स्टाइल के हो गए थे कौन क्या कर रहा है, कहाँ जा रहा है , किससे किसकी दोस्ती और किससे किसकी लड़ाई सब खबरें साहब खबरी लाल के पास । और तो और ये नाम भी कोड वर्ड में लिखा करते थे । जैसे A को 1 और B को 2 , पूरे पूरे नाम कोडिंग में ।

ग्रुप लॉबी भी खूब हुआ करती थी जैसे अपने मोहल्ले में अपने ही मोहल्ले वालों को खिलाने की कोशिश फालतू लोगों की एंट्री बेन , हालाँकि एक दो को ग्रीन कार्ड भी दे रखा था जो अपनी मोहल्ले में कम और इनके मोहल्ले में ज्यादा खेला करते थे ।

अब ना तो खाली प्लाट रहे ना ही वो बड़े मैदान हर तरफ घनी बस्ती नजर आती है जिन जगहों पर चोर सिपाही खेलते खेलते जाने कहाँ कहाँ पहुँच जाते थे वहाँ गलियां और घर ही नजर आते हैं । नई पीढ़ी खेले भी तो कहाँ खेले , शहरों के हालात तो ऐसे हैं कि एक ही मैदान में पाँच या 7 क्रिकेट मैच चल रहे होते हैं मैदान के साइज के हिसाब से , एक हम थे जो बोलते थे इस मैदान पर हम खेलते हैं तुम दूसरे पर जाकर खेल लो । खेत खाली प्लॉट खाली कहीं भी ईंट लगाई खेल शुरू ।

घर के खेलों में आज की ही तरह लूडो, चेस, कैरम , चक्कन पै और चाइनीज चेकर के साथ साथ सही और कट्टा व राजा मंत्री चोर सिपाही खेलने में मजा आता था । छुपन छुपाई की बात ही कुछ और थी नाम था आस पास धप्पा ।

…………..   क्रमशः

 

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