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महर्षि दयानंद सरस्वती

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महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती 2020 में कब है?

(Maharishi Dayanand Saraswati jayanti 2020)

महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती इस साल 18 फरवरी 2020, को मनाई जाएगी ।

महर्षि दयानंद सरस्वती Maharishi Dayanand Saraswati

महर्षि दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati) आर्य समाज के संस्थापक,  महान चिंतक, महान समाज सुधारक, राष्ट्र-निर्माता,  प्रकाण्ड विद्वान और देशभक्त थे।

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म  12 फरवरी 1824 को गुजरात के राजकोट जिले के काठियावाड़ क्षेत्र भूतपूर्व मोरवी राज्य के टंकारा में ब्राह्मण परिवार में हुआ था।  हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन महीने की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि पर  दयानन्द सरस्वती की जयंती मनाई जाती है।

बताया जाता है मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उनका नाम मूलशंकर रखा गया। उनके पिता का नाम अम्बाशंकर था और माता का नाम यशोदा बाई था। चौदह वर्ष की आयु तक मूलशंकर ने सम्पूर्ण संस्कृत व्याकरण, `सामवेद’ और ‘यजुर्वेद’ का अध्ययन कर लिया था ।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियों को दूर करने में अपना खास योगदान दिया है। उन्होंने वेदों को सर्वोच्च माना और वेदों का प्रमाण देते हुए समाज में फैली कुरीतियों का विरोध किया।

अपने 59 वर्ष के जीवन में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने राष्ट्र में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ लोगो को जगाया और अपने ज्ञान प्रकाश को देश में फैलाया । उन्होंने अपने कार्यो से समाज को नयी दिशा एवं उर्जा दी। महात्मा गाँधी जैसे कई महापुरुष स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचारों से प्रभावित थे ।

बाल्यवस्था के दौरान कुछ ऐसी घटनाएं घटीं, जिन्होंने उन्हें सच्चे भगवान,  मौत और मोक्ष का रहस्य जानने के लिए संन्यासी जीवन जीने को विवश कर दिया। उन्होंने इन रहस्यों को जानने के लिए पूरा जीवन लगा दिया और फिर जो ज्ञान हासिल हुआ, उसे पूरे विश्व को अनेक सूत्रों के रूप में बताया।

मथुरा के स्वामी विरजानंद इनके गुरू थे। इक्कीस वर्ष की आयु में घर से निकल पड़े। घर त्यागने के पश्चात 18 वर्ष तक इन्होंने सन्यासी का जीवन बिताया। इन्होंने बहुत से स्थानों में भ्रमण करते हुए कतिपय आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की।

धर्म सुधार हेतु अग्रणी रहे दयानंद सरस्वती ने 1875 में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी। वेदों का प्रचार करने के लिए उन्होंने पूरे देश का दौरा करके पंडित और विद्वानों को वेदों की महत्ता के बारे में समझाया।

स्वामी जी ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: हिंदू बनने की प्रेरणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया। 1886 में लाहौर में स्वामी दयानंद के अनुयायी लाला हंसराज ने दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की थी।

हिन्दू समाज को इससे नई चेतना मिली और अनेक संस्कारगत कुरीतियों से छुटकारा मिला।उनका मानना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है।

समाज सुधारक होने के साथ ही दयानंद सरस्वती जी ने अंग्रेजों के खिलाफ भी कई अभियान चलाए। जिससे अँग्रेजी सरकार स्वामी दयानंद से बुरी तरह तिलमिला गयी और स्वामीजी से छुटकारा पाने के लिए, उन्हें समाप्त करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे ।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिन्दी भाषा को अपनाया। उनकी सभी रचनाएं और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश’ मूल रूप में हिन्दी भाषा में लिखा गया।

कुछ घटनाओं के बाद से उनके जीवन पर गहरा आसार हुआ वे आज भी प्रासंगिक हैं जैसे :

मूल शंकर के पिता शिव के परम भक्त थे। पिता के कहने पर बालक मूलशंकर ने 14 वर्ष की उम्र में भगवान शिव का व्रत रखा। मन्दिर में स्थित शिवलिंग पर चूहे उछल कूद मचा रहे थे। जिससे बालक मूलशंकर के मन में विचार आया कि भगवान इन चूहों को भगाने की शक्ति भी नहीं रखता तो वह कैसा भगवान ?

उनकीं चौदह वर्षीय छोटी बहन की मौत हो गई। पूरा परिवार व सगे-संबंधी विलाप कर रहे थे और मूलशंकर भी गहरे सदमे व शोक में भाव-विहल थे। तभी उनके मस्तिष्क में विचार पैदा हुए कि इस संसार में जो भी आया है उसे एक न एक दिन जाना ही पड़ेगा अर्थात् सबकी मृत्यु होनी निश्चित है । अगर ऐसा है तो फिर शोक किस बात का?

क्या मृत्यु पर विजय नहीं पाई जा सकती? यदि हाँ तो कैसे? इस सवाल का जवाब पाने के लिए युवा मूलशंकर खोजबीन में लग गया।

एक आचार्य ने सुझाया कि मृत्यु पर विजय ‘योग’ से पाई जा सकती है और ‘योगाभ्यास’ के जरिए ही अमरता को हासिल किया जा सकता है। आचार्य के इस जवाब ने युवा मूलशंकर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने ‘योगाभ्यास’ के लिए घर छोड़ने का फैसला कर लिया।

जब पिता को उनकी इस मंशा का पता चला तो उन्होंने मूलशंकर को काम में लगा दिया और उनके विवाह का फैसला लिया । लेकिन मूलशंकर ने घर को त्यागकर सच्चे भगवान, मौत और मोक्ष का रहस्य जानने का दृढ़संकल्प ले लिया।

मूलशंकर ने संन्यासी बनने की राह पकड़ ली और अपना नाम बदलकर ‘शुद्ध चौतन्य ब्रह्माचारी’ रख लिया। वे सन् 1847 में घूमते-घूमते नर्मदा तट पर स्थित स्वामी पूर्णानंद सरस्वती के आश्रम में जा पहुंचे और उनसे दीक्षा ली। गुरु से उन्हें एक नया नाम मिला ‘दयानंद सरस्वती’।

एक दिन जब वे मथुरा पहुंचे तो उन्हें स्वामी विरजानंद के दर्शन हुए। पूर्ण ज्ञान प्राप्ति करने के लिए उन्होंने स्वामी जी को अपना गुरू बना लिया।

स्वामी विरजानंद ने दयानंद सरस्वती से बतौर गुरु-दक्षिणा वचन मांगते हुए कहा कि देश का उपकार करों, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो,  वैदिक धर्म का प्रचार करो। तब स्वामी दयानंद गुरु के वचनों का पालन करने आश्रम से निकल पड़े। उन्होंने देशभर का भ्रमण कर वेदों के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया।

ज्ञान की चाह में ये स्वामि विरजानंद जी से मिले और उन्हें अपना गुरु बनाया। विरजानंद ने ही इन्हें वैदिक शास्त्रों का अध्ययन करवाया। विरजानंद जी ने इन्हें समाज सुधार, समाज में व्याप्त कुरूतियों के खिलाफ कार्य करने, अंधविश्वास को मिटाने,  वैदिक शास्त्र का महत्व लोगो तक पहुँचाने जैसे कठिन संकल्पों में बाँधा और इसी संकल्प को अपनी गुरु दक्षिणा कहा ।

गुरु से मार्गदर्शन मिलने के बाद स्वामी दयानंद सरस्वती ने समूचे राष्ट्र का भ्रमण प्रारम्भ किया और वैदिक शास्त्रों के ज्ञान का प्रचार प्रसार किया। उन्हें कई विपत्तियों का सामना करना पड़ा, अपमानित होना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी अपना मार्ग नहीं बदला।

उन्होंने अलौकिक ज्ञान और मोक्ष का अचूक मंत्र दिया, ‘वेदों की ओर लौटो’। उन्होंने बताया कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है।

स्वामी दयानंद ने एक नए स्वर्णिम समाज की स्थापना के उद्देश्य से 10 अप्रेल 1875 को गिरगांव मुम्बई व पूना में ‘आर्य समाज’ नामक सुधार आन्दोलन की स्थापना की। आर्य समाज के दस प्रमुख सिद्धान्तों को सूत्रबद्ध किया गया। ये सिद्धांत आर्य समाज की शिक्षाओं का मूल निष्कर्ष हैं।

उन्होंने सन् 1874 में अपने कालजयी ग्रन्थ ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ की रचना की। वर्ष 1908 में इस ग्रन्थ का अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किया गया।

इसके अलावा उन्होंने कुल मिलाकर उन्होंने 60 पुस्तकें, 14 संग्रह, 6 वेदांग, अष्टाध्यायी टीका, अनके लेख लिखे जिनमें ‘ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका’, ‘संस्कार-विधि’, ‘आर्याभिविनय’ आदि अनेक विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की।

स्वामी दयानंद सरस्वती के तप, योग, साधना, वैदिक प्रचार, समाजोद्धार और ज्ञान का लोहा बड़े-बड़े विद्वानों और समाजसेवियों ने माना।

स्वामी जी ने जीवन भर वेदों और उपनिषदों का पाठ किया और संसार के लोगो को उस ज्ञान से लाभान्वित किया, उन्होने वैदिक धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताया ।

1857 की क्रांति में भी स्वामी जी ने अपना अमूल्य योगदान दिया अंग्रेजी हुकूमत से जमकर लोहा लिया, स्वामी दयानंद सरस्वती वैदिक धर्म में विश्वास रखते थे उन्होंने राष्ट्र में व्याप्त कुरीतियों एवम अन्धविश्वासो का सदैव विरोध किया ।

उन्होंने देश भ्रमण के दौरान उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ बोलना प्रारम्भ किया, लोगो में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आक्रोश था इसलिए उन्होंने लोगो को एकत्र करने का कार्य किया।

लोगो को जागरूक कर सभी को सन्देश वाहक बनाया गया, जिससे आपसी रिश्ते बने और एकजुटता आये। इन्होने सबसे पहले साधू संतो को जोड़ा, जिससे उनके माध्यम से जन साधारण को आजादी के लिए प्रेरित किया जा सके।

बाल विवाह की प्रथा के विरुद्ध उन्होंने स्पष्ट किया कि शास्त्रों में उल्लेखित हैं, मनुष्य जीवन में 25 वर्ष ब्रम्हचर्य के है उसके अनुसार बाल विवाह एक कुप्रथा हैं ।

दयानन्द सरस्वती जी ने विधवा नारियों के पुनर्विवाह के लिये अपना मत दिया और लोगो को इस ओर जागरूक किया। स्वामी जी ने सदैव नारी शक्ति का समर्थन किया उनका मानना था कि नारी शिक्षा ही समाज का विकास हैं। पति के साथ पत्नी को भी उसकी मृत्यु शैया पर अग्नि को समर्पित कर सती करने की अमानवीय सतीप्रथा का भी उन्होने विरोध किया। उन्होंने नारी को समाज का आधार कहा और कहा उनका शिक्षित होना जरुरी हैं।

उन्होंने सदैव कहा शास्त्रों में वर्ण भेद शब्द नहीं, बल्कि वर्ण व्यवस्था शब्द हैं । जिसके अनुसार चारों वर्ण केवल समाज को सुचारू बनाने के अभिन्न अंग हैं, जिसमे कोई छोटा बड़ा नहीं अपितु सभी अमूल्य हैं। उन्होंने सभी वर्गों को समान अधिकार देने की बात रखी और वर्ण भेद का विरोध किया ।

एक बार स्वामी दयानन्द सरस्वती जोधपुर के महाराज राजा यशवंत सिंह के यहाँ गए । राजा ने उनका बहुत आदर सत्कार किया उनके कई व्यख्यान सुने। एक दिन जब राजा यशवंत एक नर्तकी नन्ही जान के साथ भोग विलास लिप्त थे, तब स्वामी जी ने यह सब देखा और इसका विरोध किया ।

स्वामी जी की बात मान यशवंत सिंह ने नन्ही जान से अपने रिश्ते खत्म कर दिए। इस कारण नन्ही जान स्वामी जी से नाराज हो गई और उसने रसोईया के साथ मिलकर स्वामी जी के भोजन में जहर मिला दिया, जिससे स्वामी जी का स्वास्थ बहुत ख़राब हो गया।

रसोईया ने अपनी गलती स्वीकार कर माफ़ी मांगी स्वामी जी ने उसे माफ़ कर दिया।

काफी इलाज के बाद भी हालत में सुधार नहीं आया और उन्होंने 30 अक्टूबर 1883 में उनकी म्रत्यु हो गई।

 

 

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