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बैंक हड़ताल में कटती है बैंक कर्मियों की सैलरी

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बैंक हड़ताल में कटती है बैंक कर्मियों की सैलरी

फिर भी सरकारी बैंकों में बार बार हड़ताल क्यों? इस माह 31 जनवरी फिर 1 फरबरी और उसके बाद 11 से 13 मार्च तीन दिन और 1 अप्रेल से लगातार हड़ताल पर जाकर अपनी सैलरी क्यों कटवा रहे 10 लाख से अधिक कर्मचारी ?

सर्वप्रथम आपको ये अवगत कराना आवश्यक है कि बैंककर्मियों को हड़ताल करने पर आर्थिक नुकसान सहन करना पड़ता है क्योंकि हड़ताल के दिनों का वेतन उनकी सैलरी से काट लिया जाता है।

सावधान कई बैंक हड़ताल आएंगी एक साथ

केंद्र और राज्य कर्मचारियों की वेतनवृद्धि के लिए सरकार पे कमिशन (सीपीसी ) का गठन करती है। किन्तु 10 लाख बैंककर्मियों की वेतनवृद्धि IBA व बैंक यूनियंस के मध्य द्विपक्षीय समझौता  के द्वारा तय होता है।

मिली जानकारी के अनुसार CPC की तरह IBA को किसी भी सरकार द्वारा वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं है । बैंककर्मियों की वेतनवृद्धि 2017 से देय है पर 27 महीना बीत जाने के बाद भी इसके जल्द होने के कोई आसार नहीं हैं।

बैंक कर्मी इसलिए भी नाराज हैं कि इस बार IBA ने शुरुआत में मात्र 2 प्रतिशत का ऑफर देकर  बैंककर्मियों को बेइज़्ज़त करने का काम किया है जबकि बैंकों का पिछला वेतनवृद्धि  15% की वृद्धि पर हुआ था।

यूनियनों के अनुसार मई 2018 को वित्त मंत्रालय ने IBA को  निर्देश दिया था कि CPC की भांति बैंक में वेतनवृद्धि को समय से लागू कर दिया जाए। किन्तु IBA अलग हटकर कार्य कर रही है।

XI BIPARTITE SETTLEMENT update

UFBU के अनुसार 2018 से 2019 के बीच बैंककर्मियों ने सम्मानजनक वेतनवृद्धि के लिए 6 दिनों की हड़ताल की फिर भी IBA ने मामले को संवेदनशील नहीं माना और हड़ताल से जनता को परेशान होने दिया गया।

IBA की सौदेबाज़ी व हठधर्मिता के कारण यूनियंस ने इस बार लंबी लड़ाई (लगातार हड़ताल) का फैसला कर लिया है जिसके चलते आम जनता को भारी परेशानी होने वाली है।

Bank DA from February 2020 to April 2020

यूनियनों की तरफ से आमजन को बताया जा रहा है कि हड़ताल थोपी जा रही है मांगें IBA सुन नहीं रही जबकि सरकार चाहती थी कि जल्द वेतन समझौता हो जाए ।

यूनियन लीडर के अनुसार बैंक कर्मी का वेतन मौजूदा समय में केन्द्रीय कर्मियों की अपेक्षा बहुत कम है वे केंद्र के चपरासी व क्लर्क से कम शुरुआती वेतन पाते हैं।इतनी रिस्क वाली नौकरी के बाद भी बैंक अफसर केंद्रसरकार के क्लर्क के बराबर वेतन पाता  है।

सरकारी नीतियाँ और वसूली के लचर कानून से परेशान 

यूनियन लीडर के अनुसार IBA इस बात का रोना रोती है कि बैंक घाटे में हैं। ये भी भ्रम फैलाया जा रहा है। देश मे बड़े बड़े अमीर लोग को बैंको से राजनीतिक चंदे के लिए लाखों करोड़ का लोन दे दिया जाता है जिसमे बैंक कर्मियों का कोई रोल नहीं ये सब खेल ऊपर ऊपर खेला जाता है।

वसूली के लचर कानून की वजह से ये अमीर कर्ज़ को वापस नहीं करते जिसके कारण बैंकों का NPA लाखो करोड़ हो जाता है। बैंक हमेशा ऑपरेटिंग प्रॉफिट में रहे हैं लेकिन NPA का प्रोवीजन करने के कारण वो घाटे में चले जाते हैं।

Bank Strike in a raw

क्या चाहिए समाजसेवा या लाभ ?

साफ है कि बैंको के घाटे में जाने की असली वजह सरकार की नीतियां और वसूली के लचर कानून है। सरकारी बैंकों का उदेश्य समाज की सेवा करना व सरकारी योजनाओं पर अमल करना है । समाजसेवा के उद्देश्य से सरकार ने निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था।

कोई कार्य समाज के लिए किया जाता उसमे लाभ का उद्देश्य निहित नहीं होता है। सरकारी स्कूल, हॉस्पिटल, पुलिस ,दमकल, आदि विभाग लाभ कमाने के उद्देश्य से नहीं बनाए गए हैं। इन विभागों में उनकी सैलरी से प्रॉफिट का कोई संबंध नहीं है। NPA क्यों बढ़ते जा रहे हैं ये सरकार भी भली भांति जानती समझती है।

सभी बैंक प्रॉफिट में हैं लेकिन लोन बसूली के नियम सख्त न होने से लोग लोन नहीं चुकाते जिन्हें बाद में बट्टे खाते डलवा दिया जाता है ऐसे में बैंक कर्मियों का क्या दोष ? निजी बैंक कर पाते हैं अच्छे से बसूली जबकि सार्वजानिक बैंक समाज सेवा में ही लगे रहते हैं ।

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